एक पागल वैज्ञानिक के नाम ख़त
सुनो मेरे प्यारे पागल वैज्ञानिक
मैं भारत में जन्मी एक लड़की तुम्हें ये ख़त लिख रही हूँ ये बताने के लिए कि इस देश में जहाँ मैं पैदा हुई वहाँ विज्ञान का मतलब प्रोफेसर यशपाल, न्यूटन, स्टीफ़न या आइंस्टाइन नहीं होता. यहाँ विज्ञान का मतलब होता है पुष्पक विमान, नियोग, गणेश की सूंड वाली प्लास्टिक सर्जरी, मोरनी के आंसू एट्सएक्ट्रा.
क्या तुम्हें पता है कि यहाँ के बच्चे जब बड़े होते हैं तब वो हॉलीवुड की साइंस फ़िक्शन फिल्में देखते हैं. उन साइंस फ़िक्शन फिल्मों में ज़्यादातर दिखाई देने वाले वैज्ञानिक पागल टाइप के होते हैं. उनका ये पागलपन, ये जुनून, उनके लिए इतना मायने रखता है कि वो अपने काम को अंजाम तक पंहुंचा कर ही दम लेता है.
अब तुमसे क्या कहूँ .... यहाँ किसी भी बच्चे में वैसा पागलपन उमड़ने भी लगे तो वो मार्क्स, नौकरी, अच्छी लड़की/लड़के से शादी, चार लोग क्या कहेंगे(मालिक जाने कौन चार लोग हैं जो माँ-बाप को इतना डरा देते हैं कि बस अब तो इज़्ज़त को फांसी ही लग जायेगी काइंड ऑफ), कैसे जियेगा अपनी ज़िन्दगी वग़ैरह के बोझ तले ऐसा दबाया और फंसाया जाता है कि उसकी सारी की सारी क्षमता इस देश के मानकों से लड़ने में ही फुस्स हो जाती है. कुछ जो मौक़ा पा जाते हैं यहां से भाग ही जाते हैं. कुछ बेचारे जो सोचते हैं कि सरकार उनका साथ देगी वो बेचारे डिग्री से मार खाते हैं. नेट पास किया ? जे आर एफ नहीं हो ? पीएचडी नहीं किये हो क्या ? बेचारा/बेचारी पागलपन के होते हुए भी पगलाय जाते है कि अब क्या करे?
फ़िज़िक्स के जो थियोरम वो चुटकियों में अप्लाई कर सकते हैं वो एग्जाम में पास नहीं हो पाते क्योंकि एग्जाम के लिए रट्टू पक्षियों की तरह वो रट नहीं सकते.
शायद तुम्हें ये भी न पता हो कि यहाँ कुछ कर लेने के जुनून का तब तक कोई मतलब नहीं होता जब तक कि उससे पैसा न आये. यहाँ जिसमें भी जुनून पाया गया वो सबसे बड़ा अपराधी बना परिवार और समाज की नज़र में.
जानते हो, यहाँ विज्ञान पढ़ने का मतलब सिर्फ़ डॉक्टर या इंजीनियर बन कर पैसा कमाना है. थोड़ा सा आगे बढ़ गए तो किसी और फील्ड में नेट-वेट पास करके पिरोफिसरी कर लेना है.
जो थोड़े ज़्यादा बढ़िया पदों पर पहुंच जाते हैं और कुछ बढ़िया काम करने लगते हैं वो निपटवा दिए जाते हैं और उनकी मौत की तो ख़बर भी अख़बार में नहीं आती.
तुम्हें तो ये भी नहीं पता होगा कि यहाँ के बच्चे M.Sc. पास कर जाने के बाद भी ये नहीं जानते कि DNA में कितने डंडे(strands) होते हैं. कई तो पीएचडी के बाद भी नहीं बता पाते.
कुछ तो मौका निकाल कर दूसरे देश भाग जाते हैं, वैसे भी यहां उन्हें इज़्ज़त और प्यार भी तो नसीब नहीं होता, यहां रहकर बेचारे करें भी तो क्या.
यहाँ के वैज्ञानिकों में तुम्हारी तरह कुछ कर गुज़रने वाला पागलपन भी दशकों में कभी एक बार देखने को मिलता है. मगर फिर भी वैज्ञानिक नाम के जो भी प्राणी यहां हैं उनके बारे में तुम्हें एक मज़ेदार बात बताती हूं, देखो नाराज़ मत होना... यहाँ पर तो स्पेस शटल लांच करने के पहले भी पंडी जी से पूजा पाठ यज्ञ वगैरह करवाया जाता है.
मैं हैरान होती हूँ कि आइंस्टाइन जैसा वैज्ञानिक अपने आख़िरी वक़्त में ये कह कर गया कि मैं जैसा अज्ञानी पैदा हुआ था वैसा ही अज्ञानी मर रहा हूँ मगर दुनिया मुझे जीनियस समझती है. आइंस्टाइन की ये बात मुझे झकझोर देती है कि इतना बड़ा वैज्ञानिक होने के बावजूद भी वो बच्चों जैसी मासूमियत से भरा हुआ था जबकि यहां तो किसी शास्त्र के चार मंत्र रट लेने वाला भी ख़ुद को सर्वज्ञानी कहलवाता है.
यहाँ पर मिलने वाली बाहर की किताबें भी ओरिजनल कॉपीज नहीं होती हैं. गरीब देश वाली प्रतियां बिकती हैं यहाँ क्योंकि सरकार हर बार शिक्षा बजट कम जो कर देती हैं. महँगाई इतनी है कि माँ बाप एक वक़्त का खाना खा कर बच्चे को पढ़ाते हैं. और जब उस पढ़ाई से पैसा न मिले तो उनकी नज़र में बच्चा फ्रॉड बन जाता है जो माँ-बाप की दी हुई सुविधाओं पर ऐश कर रहा था.
तुमने शायद ये पढ़ लिया होगा कि यहां बीते कुछ सालों से परीक्षा में फेल हो जाने के डर से लगभग 14000 विद्यार्थी हर साल आत्महत्या करके अपनी अर्थी उठवा लेते हैं.
इतना कुछ है कि मैं अब लिख भी नहीं पा रही. हाथ दुखने लगा है. तुम तो अब जहाँ में नहीं हो, फिर भी अगर तुम तक ये ख़त पंहुचे तो एक गुज़ारिश है तुमसे .. हो सके तो अपने पागलपन के कुछ क़तरे बारिश बना कर यहाँ भी भेज देना. यहाँ भी किसी प्रोफेसर यशपाल, रामन, भाभा, रामानुजन, जगदीश चन्द्र बोस, आइंस्टाइन या स्टीफ़न की ज़रूरत है.
- सिमन्तिनी
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