Monday, March 15, 2021

पागल वैज्ञानिक के नाम ख़त

 एक पागल वैज्ञानिक के नाम ख़त 


सुनो मेरे प्यारे पागल वैज्ञानिक 



मैं भारत में जन्मी एक लड़की तुम्हें ये ख़त लिख रही हूँ  ये बताने के लिए कि इस देश में जहाँ मैं पैदा हुई वहाँ विज्ञान का मतलब प्रोफेसर यशपाल, न्यूटन, स्टीफ़न या आइंस्टाइन नहीं होता. यहाँ विज्ञान का मतलब होता है पुष्पक विमान, नियोग, गणेश की सूंड वाली प्लास्टिक सर्जरी, मोरनी के आंसू एट्सएक्ट्रा.  


क्या तुम्हें पता है कि यहाँ के बच्चे जब बड़े होते हैं तब वो हॉलीवुड की साइंस फ़िक्शन फिल्में देखते हैं. उन साइंस फ़िक्शन फिल्मों में ज़्यादातर दिखाई देने वाले वैज्ञानिक पागल टाइप के होते हैं. उनका ये पागलपन, ये जुनून, उनके लिए इतना मायने रखता है कि वो अपने काम को अंजाम तक पंहुंचा कर ही दम लेता है. 


अब तुमसे क्या कहूँ .... यहाँ किसी भी बच्चे में वैसा पागलपन उमड़ने भी लगे तो वो मार्क्स, नौकरी, अच्छी लड़की/लड़के से शादी, चार लोग क्या कहेंगे(मालिक जाने कौन चार लोग हैं जो माँ-बाप को इतना डरा देते हैं कि बस अब तो इज़्ज़त को फांसी ही लग जायेगी काइंड ऑफ), कैसे जियेगा अपनी ज़िन्दगी वग़ैरह के बोझ तले ऐसा दबाया और फंसाया जाता है कि उसकी सारी की सारी क्षमता इस देश के मानकों से लड़ने में ही फुस्स हो जाती है. कुछ जो मौक़ा पा जाते हैं यहां से भाग ही जाते हैं. कुछ बेचारे जो सोचते हैं कि सरकार उनका साथ देगी वो बेचारे डिग्री से मार खाते हैं. नेट पास किया ? जे आर एफ नहीं हो ? पीएचडी नहीं किये हो क्या ? बेचारा/बेचारी पागलपन के होते हुए भी पगलाय जाते है कि अब क्या करे? 


फ़िज़िक्स के जो थियोरम वो चुटकियों में अप्लाई कर सकते हैं वो एग्जाम में पास नहीं हो पाते क्योंकि एग्जाम के लिए रट्टू पक्षियों की तरह वो रट नहीं सकते. 


शायद तुम्हें ये भी न पता हो कि यहाँ कुछ कर लेने के जुनून का तब तक कोई मतलब नहीं होता जब तक कि उससे पैसा न आये. यहाँ जिसमें भी जुनून पाया गया वो सबसे बड़ा अपराधी बना परिवार और समाज की नज़र में. 


जानते हो, यहाँ विज्ञान पढ़ने का मतलब सिर्फ़ डॉक्टर या इंजीनियर बन कर पैसा कमाना है. थोड़ा सा आगे बढ़ गए तो किसी और फील्ड में नेट-वेट पास करके पिरोफिसरी कर लेना है. 


जो थोड़े ज़्यादा बढ़िया पदों पर पहुंच जाते हैं और कुछ बढ़िया काम करने लगते हैं वो निपटवा दिए जाते हैं और उनकी मौत की तो ख़बर भी अख़बार में नहीं आती.  


तुम्हें तो ये भी नहीं पता होगा कि यहाँ के बच्चे M.Sc. पास कर जाने के बाद भी ये नहीं जानते कि DNA में कितने डंडे(strands) होते हैं. कई तो पीएचडी के बाद भी नहीं बता पाते.  


कुछ तो मौका निकाल कर दूसरे देश भाग जाते हैं, वैसे भी यहां उन्हें इज़्ज़त और प्यार भी तो नसीब नहीं होता, यहां रहकर बेचारे करें भी तो क्या. 


यहाँ के वैज्ञानिकों में तुम्हारी तरह कुछ कर गुज़रने वाला पागलपन भी दशकों में कभी एक बार देखने को मिलता है. मगर फिर भी वैज्ञानिक नाम के जो भी प्राणी यहां हैं उनके बारे में तुम्हें एक मज़ेदार बात बताती हूं, देखो नाराज़ मत होना... यहाँ पर तो स्पेस शटल लांच करने के पहले भी पंडी जी से पूजा पाठ यज्ञ वगैरह करवाया जाता है. 


मैं हैरान होती हूँ कि आइंस्टाइन जैसा वैज्ञानिक अपने आख़िरी वक़्त में ये कह कर गया कि मैं जैसा अज्ञानी पैदा हुआ था वैसा ही अज्ञानी मर रहा हूँ मगर दुनिया मुझे जीनियस समझती है. आइंस्टाइन की ये बात मुझे झकझोर देती है कि इतना बड़ा वैज्ञानिक होने के बावजूद भी वो बच्चों जैसी मासूमियत से भरा हुआ था जबकि यहां तो किसी शास्त्र के चार मंत्र रट लेने वाला भी ख़ुद को सर्वज्ञानी कहलवाता है.


यहाँ पर मिलने वाली बाहर की किताबें भी ओरिजनल कॉपीज नहीं होती हैं. गरीब देश वाली प्रतियां बिकती हैं यहाँ क्योंकि सरकार हर बार शिक्षा बजट कम जो कर देती हैं. महँगाई इतनी है कि माँ बाप एक वक़्त का खाना खा कर बच्चे को पढ़ाते हैं. और जब उस पढ़ाई से पैसा न मिले तो उनकी नज़र में बच्चा फ्रॉड बन जाता है जो माँ-बाप की दी हुई सुविधाओं पर ऐश कर रहा था. 


तुमने शायद ये पढ़ लिया होगा कि यहां बीते कुछ सालों से परीक्षा में फेल हो जाने के डर से लगभग 14000 विद्यार्थी हर साल आत्महत्या करके अपनी अर्थी उठवा लेते हैं. 


इतना कुछ है कि मैं अब लिख भी नहीं पा रही. हाथ दुखने लगा है. तुम तो अब जहाँ में नहीं हो, फिर भी अगर तुम तक ये ख़त पंहुचे तो एक गुज़ारिश है तुमसे .. हो सके तो अपने पागलपन के कुछ क़तरे बारिश बना कर यहाँ भी भेज देना. यहाँ भी किसी प्रोफेसर यशपाल, रामन, भाभा, रामानुजन, जगदीश चन्द्र बोस, आइंस्टाइन या स्टीफ़न की ज़रूरत है. 


- सिमन्तिनी

Tuesday, November 8, 2016

एक चिट्ठी दशहरे पर ..



योगी की भांति देह तजकर आत्मा के तार मिलाने हैं
आराध्य देव के चरणों में प्राणों के फूल चढाने हैं
(राधेश्याम रामायण के अंश जो रामलीला के मंचन में गायी जाती है).
नगाड़े की आवाज़ के साथ पर्दा खुलता और एक तेज़ सुरीला स्वर हवा में गुलाबी ठण्ड की आहट देता हुआ गूँज जाता......माँ बताती है कि नवरात्रि शुरू होने के साथ ही शहर में रामलीला का दौर शुरू हो जाता था उसके बचपन में. बच्चे-बड़े बूढ़े मिलकर रामलीला का मंचन करते. हिन्दू मुसलमान सब मिलकर पात्र बनते, उत्सव मनाते और जीवन के रंगमंच पर अपने जीवित होने का सबूत देते. दशहरे के रोज़ उनके छोटे से शहर में एक बहुत बड़े मैदान में मेला लगता था जो "रावण का मेला" कहलाता था. गोधूलि में सई नदी के किनारे रस्सियों से तान कर खड़े रावण के पेट में जलता हुआ तीर मार दहन होता और चल पड़ते सब अगले दिन के भरत मिलाप की झांकी की तैयारी करने. सवारियां सारे शहर में घूमतीं और ख़त्म होता था दशहरा. तब धर्मोत्सव नहीं उत्सव धर्म होता था जो समाज में सौहार्द्र को इंगित करता था. मगर ये बीते वक़्त की बात हुई. अब के दशहरे को दुर्गा पूजा ने थोड़ा धुंधला कर दिया है. बिना अर्थ समझे हर गली मोहल्ले की चौड़ी सड़क पर एक दुर्गा पूजा का पंडाल लगा होता है और रोड ब्लॉक. आने जाने वालों को परेशानी और लाउड स्पीकर के शोर से मोहल्ले वालों को. और इन सब बातों पर किसी का कोई ध्यान नहीं है. न पब्लिक का और न नौकरशाहों का. सब के सब खरबूजों की तरह व्यवहार करते हैं.
लेकिन इस बार का दशहरा सर्जिकल स्ट्राइक के रंग में रंगा हुआ जान पड़ा. मेन स्ट्रीम, सोशल मीडिया, अखबार, मैगज़ीन सभी पर सर्जिकल स्ट्राइक का खुमार कुछ इस तरह छाया रहा जैसे इसके पहले कभी ऐसा हुआ ही नहीं. ऐसे जताया गया मीडिया के द्वारा जैसे पाकिस्तान रावण है और भारत राम. अब तक राम और रावण के बीच समता और विषमता का बोध हमें हुआ ही नहीं. हम एक देश की सेना भेज कर दूसरे देश की सेना के लोगों को मारते हैं, मसलन आतंकवादियों को भी मार देते हैं तो क्या इसके बाबत आतंकवाद का अंत हो जायेगा ? क्या दोनों देशों की जनता जो सिर्फ रोटी-पानी की सामान्य ज़रूरतों के न पूरे हो पाने की जद्दोजहद में बेचैन है वो बेचैनी ख़त्म हो जाएगी ? जो दहशतगर्दों को संरक्षण देने में जुटे हैं क्या वो ख़त्म हो जायेंगेऔर आतंकवाद को एक साइड में रख दें तो वो सैनिक जो मारे गए उनके घरों के दशहरे का क्या ? और सर्जिकल स्ट्राइक की आड़ में तथाकथित दिव्यांग सैनिकों को मिलने वाली पेंशन आधी कर दी गई उसका क्या ?  साथ ही इस बार मुहर्रम भी आया मगर मुहर्रम को लेकर कोई शोर नहीं. वह भी किसी के बचाव का प्रतीक है. भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है. सर्वधर्म समभाव यहाँ की खुशबू है. मगर अब तक हमें सम्मान देना नहीं आया. देश भी दुनिया का ही हिस्सा हैं ये हम अब तक नहीं सीख पाए. दशहरा यूँ तो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है मगर दोनों का अस्तित्व एक दूसरे के बिना अधूरा है. राम की कथा से रावण हटा दिया तो कथा बस गप्प होकर रह जाएगी. दक्षिण में रावण की पूजा की जाती है और उत्तर भारत में राम की.मगर अब एक नया ट्रेंड है दक्षिण भारत में राम दहन का. इन पौराणिक कथाओं का अर्थ हमने अपनी ज़रूरत के हिसाब से गढ़ लिया मगर हम ये अब तक नहीं समझ पाए कि कथा जीवन को बेहतर बनाने के लिए है न कि थोथे आदर्शों के नाम पर लकीर पीटने के लिए. लेकिन हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हो बस ढोये जाते हैं परम्पराओं का बोझ जो कब हमारे जीन्स में उतर कर आगे चला जाता है पता ही नहीं चलता. 
इस बार दशहरे की सियासी रंगत कुछ और ही थी. सियासतदां दशहरे पर अपनी रोटियां सेंक रहे थे और जनता लकीर के नीचे पिट रही थी या खुद ही पीट रही थी खुद को, आप खुद तय करें. दशहरा हर बार मेरे लिए एक अनसुलझा सवाल छोड़ कर जाता है वो ये कि क्या रावण का रूपांतरण नहीं कर सके राम? क्या राम इतने कमज़ोर थे कि अपना महत्त्व बढ़ाने को उन्हें रावण का सहारा लेना पड़ा ? दरअसल राम को अगर रावण का सहारा न हो तो राम का अस्तित्व ही संभव नहीं हो सकेगा. और विभीषण की भूमिका सिर्फ एक भेदिये की थी जिसने रावण को मारने का मार्ग सुझाया. वो चाहता तो रावण की कोई कमज़ोरी ढूंढ कर रावण के रूपांतरण की बात कर सकता था. एक ऐसा देश जहाँ चार्वाक, महावीर और बुद्ध जैसे महान लोग हुए जिन्होंने चित्त के रूपांतरण के सहज तरीके बताये उनमे से कोई तरीका काम न आया ? जवाब न तो इतिहास के पन्नों में हैं न धर्म के ठेकेदारों के पास जो अपने गुर्गों के बिना बिल्कुल वैसा ही होता है जैसी बिना बारूद तोप. मगर हर बार त्योहारों के नाम पर मज़हबी उन्माद बढ़ाने वाले गुर्गों की वजह से ही सारा बवाल नहीं होता. हमें इसकी तह तक जाना होगा. विश्व राजनीति के प्रणेताओं को ये पता है कि भारत के पास युवा शक्ति सबसे ज़्यादा है और जिस दिन वो जागेगी दुनिया उसके सामने झुक कर सलाम करने को मजबूर हो जाएगी लेकिन अंतराष्ट्रीय नीतियों के तहत भारत में, और सिर्फ भारत में ही नहीं समूचे दक्षिण एशिया में और अफ्रीका में एक उन्माद फैलाने की बहुत बड़ी वजह ये भी है कि विकसित देश अपने लिए बाज़ार की कमी नहीं होने देना चाहते और हमारे देश के सियासतदां FDI के चक्कर में बहुत बड़ी गलतियां जानबूझ कर करते हैं. आम आदमी अपनी निजी ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में अख़बार के चंद पन्ने तक नहीं पलट पाता है. पूरा जाल इमरती जैसा, एक सिर पकड़ो तो दूसरा खो जाता है. लेकिन इसके मूल में बात बस इतनी है कि हर कोई जब सजग होकर एक एक सिरे को थाम लेगा तो ये जाल भी सुलझाया जा सकता है. ज़रूरत बस आपकी पैनी नज़र की है. अपनी बात ख़त्म करते-करते आने वाले त्यौहार दीवाली की भी बधाई. मन के साथ नज़र भी रोशन हो इसी भावना के साथ .....

सिमंतिनी रमेश वेलुस्कर  

Wednesday, February 19, 2014

tumhaari us mulaakat me maine khud ko tumhare andar dekha tha ..... main khud me kaihin shayad hi bachi thi .... tumhaare hone ka sawaal nahi tha ....mere khone ka sawaal tha ..... aur ye sawaal hi uska jawab ban gaya..... 

Sunday, February 9, 2014

Oh Krishna !!Why to live....Without you.... The purpose of life is missing;Why to die.... Without you.... The grievance of death is nothing;Why to cry ...Without you...Tears are not clutching;Oh Krishna !!My meaning is your blessing;Pour some light of peace to ma soulThy I may rebuilt me positive Once again.
....

Saturday, July 24, 2010

kitni ajeeb baat hai man naam ka koi organ body me nahi hota hai par saari duniya usi se govern hoti hai.

Saturday, July 10, 2010

go and search new horizons...

we all are covered by masks .. many type of masks many times in life. Nothing we do is simple we always wanna do complex things. its very difficult to be simple. Its a well known line but the main part is the implementation.