योगी की भांति
देह तजकर आत्मा के तार मिलाने हैं
आराध्य देव के
चरणों में प्राणों के फूल चढाने हैं
(राधेश्याम रामायण
के अंश जो रामलीला के मंचन में गायी जाती है).
नगाड़े की आवाज़ के
साथ पर्दा खुलता और एक तेज़ सुरीला स्वर हवा में गुलाबी ठण्ड की आहट देता हुआ गूँज
जाता......माँ बताती है कि नवरात्रि शुरू होने के साथ ही शहर में रामलीला का दौर
शुरू हो जाता था उसके बचपन में. बच्चे-बड़े बूढ़े मिलकर
रामलीला का मंचन करते. हिन्दू मुसलमान सब मिलकर पात्र बनते, उत्सव मनाते और जीवन के रंगमंच पर अपने जीवित होने का सबूत
देते. दशहरे के रोज़ उनके छोटे से शहर में एक बहुत बड़े मैदान में मेला लगता था जो
"रावण का मेला" कहलाता था. गोधूलि में सई नदी के किनारे रस्सियों से तान
कर खड़े रावण के पेट में जलता हुआ तीर मार दहन होता और चल पड़ते सब अगले दिन के भरत
मिलाप की झांकी की तैयारी करने. सवारियां सारे शहर में घूमतीं और ख़त्म होता था
दशहरा. तब धर्मोत्सव नहीं उत्सव धर्म होता था जो समाज में सौहार्द्र को इंगित करता
था. मगर ये बीते वक़्त की बात हुई. अब के दशहरे को दुर्गा पूजा ने थोड़ा धुंधला कर
दिया है. बिना अर्थ समझे हर गली मोहल्ले की चौड़ी सड़क पर एक दुर्गा पूजा का पंडाल
लगा होता है और रोड ब्लॉक. आने जाने वालों को परेशानी और लाउड स्पीकर के शोर से
मोहल्ले वालों को. और इन सब बातों पर किसी
का कोई ध्यान नहीं है. न पब्लिक का और न नौकरशाहों का. सब के सब खरबूजों की तरह
व्यवहार करते हैं.
लेकिन इस बार का
दशहरा सर्जिकल स्ट्राइक के रंग में रंगा हुआ जान पड़ा. मेन स्ट्रीम, सोशल मीडिया, अखबार, मैगज़ीन सभी पर
सर्जिकल स्ट्राइक का खुमार कुछ इस तरह छाया रहा जैसे इसके पहले कभी ऐसा हुआ ही
नहीं. ऐसे जताया गया मीडिया के द्वारा जैसे पाकिस्तान रावण है और भारत राम. अब तक
राम और रावण के बीच समता और विषमता का बोध हमें हुआ ही नहीं. हम एक देश की सेना
भेज कर दूसरे देश की सेना के लोगों को मारते हैं, मसलन आतंकवादियों को भी मार देते हैं तो क्या इसके बाबत
आतंकवाद का अंत हो जायेगा ? क्या दोनों देशों
की जनता जो सिर्फ रोटी-पानी की सामान्य ज़रूरतों के न पूरे हो पाने की जद्दोजहद में
बेचैन है वो बेचैनी ख़त्म हो जाएगी ? जो दहशतगर्दों को संरक्षण देने में जुटे हैं क्या वो ख़त्म हो जायेंगे ? और आतंकवाद को एक
साइड में रख दें तो वो सैनिक जो मारे गए उनके घरों के दशहरे का क्या ? और सर्जिकल स्ट्राइक की आड़ में तथाकथित
दिव्यांग सैनिकों को मिलने वाली पेंशन आधी कर दी गई उसका क्या ? साथ ही
इस बार मुहर्रम भी आया मगर मुहर्रम को लेकर कोई शोर नहीं. वह भी किसी के बचाव का
प्रतीक है. भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है. सर्वधर्म समभाव यहाँ की खुशबू है. मगर
अब तक हमें सम्मान देना नहीं आया. देश भी दुनिया का ही हिस्सा हैं ये हम अब तक
नहीं सीख पाए. दशहरा यूँ तो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है मगर दोनों का
अस्तित्व एक दूसरे के बिना अधूरा है. राम की कथा से रावण हटा दिया तो कथा बस गप्प
होकर रह जाएगी. दक्षिण में रावण की पूजा की जाती है और उत्तर भारत में राम की.मगर
अब एक नया ट्रेंड है दक्षिण भारत में राम दहन का. इन पौराणिक कथाओं का अर्थ हमने
अपनी ज़रूरत के हिसाब से गढ़ लिया मगर हम ये अब तक नहीं समझ पाए कि कथा जीवन को
बेहतर बनाने के लिए है न कि थोथे आदर्शों के नाम पर लकीर पीटने के लिए. लेकिन हम पूर्वाग्रह
से ग्रसित हो बस ढोये जाते हैं परम्पराओं का बोझ जो कब हमारे जीन्स में उतर कर आगे
चला जाता है पता ही नहीं चलता.
इस बार दशहरे की
सियासी रंगत कुछ और ही थी. सियासतदां दशहरे पर अपनी रोटियां सेंक रहे थे और जनता
लकीर के नीचे पिट रही थी या खुद ही पीट रही थी खुद को, आप खुद तय करें. दशहरा हर बार मेरे लिए एक अनसुलझा सवाल छोड़
कर जाता है वो ये कि क्या रावण का रूपांतरण नहीं कर सके राम? क्या राम इतने कमज़ोर थे कि अपना महत्त्व बढ़ाने
को उन्हें रावण का सहारा लेना पड़ा ? दरअसल राम को अगर रावण का सहारा न हो तो राम का अस्तित्व ही संभव नहीं हो
सकेगा. और विभीषण की भूमिका सिर्फ एक भेदिये की थी जिसने रावण को मारने का मार्ग
सुझाया. वो चाहता तो रावण की कोई कमज़ोरी ढूंढ कर रावण के रूपांतरण की बात कर सकता
था. एक ऐसा देश जहाँ चार्वाक, महावीर और बुद्ध
जैसे महान लोग हुए जिन्होंने चित्त के रूपांतरण के सहज तरीके बताये उनमे से कोई
तरीका काम न आया ? जवाब न तो इतिहास
के पन्नों में हैं न धर्म के ठेकेदारों के पास जो अपने गुर्गों के बिना बिल्कुल
वैसा ही होता है जैसी बिना बारूद तोप. मगर हर बार त्योहारों के नाम पर मज़हबी
उन्माद बढ़ाने वाले गुर्गों की वजह से ही सारा बवाल नहीं होता. हमें इसकी तह तक
जाना होगा. विश्व राजनीति के प्रणेताओं को ये पता है कि भारत के पास युवा शक्ति
सबसे ज़्यादा है और जिस दिन वो जागेगी दुनिया उसके सामने झुक कर सलाम करने को मजबूर
हो जाएगी लेकिन अंतराष्ट्रीय नीतियों के तहत भारत में, और सिर्फ भारत में ही नहीं समूचे दक्षिण एशिया में और
अफ्रीका में एक उन्माद फैलाने की बहुत बड़ी वजह ये भी है कि विकसित देश अपने लिए
बाज़ार की कमी नहीं होने देना चाहते और हमारे देश के सियासतदां FDI के चक्कर में बहुत बड़ी गलतियां जानबूझ कर करते
हैं. आम आदमी अपनी निजी ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में अख़बार के
चंद पन्ने तक नहीं पलट पाता है. पूरा जाल इमरती जैसा, एक सिर पकड़ो तो दूसरा खो जाता है. लेकिन इसके मूल में बात
बस इतनी है कि हर कोई जब सजग होकर एक एक सिरे को थाम लेगा तो ये जाल भी सुलझाया जा
सकता है. ज़रूरत बस आपकी पैनी नज़र की है. अपनी बात ख़त्म करते-करते आने वाले त्यौहार
दीवाली की भी बधाई. मन के साथ नज़र भी रोशन हो इसी भावना के साथ .....
सिमंतिनी रमेश
वेलुस्कर
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